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बुधवार, 18 अप्रैल 2018

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण --पोस्ट १०----उपसंहार ----डा श्याम गुप्त


                          


   भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र-संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण- --डा श्यामगुप्त
 ---पोस्ट-दस-अंतिम किश्त----
पूर्वापर----
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        भावसृष्टि सृजन के समय ब्रह्मा जी को नींद आगई, असावधानीवश आसुरी सृष्टि का सृजन होगया अतः बुराई का जन्म हुआ और बुरे भावों व लोगों की सृष्टि | एक तात्विक विचार यह भी है कि जीवधारियों-प्राणियों-मनुष्यों को अच्छाई का ज्ञान निरंतर होता रहे, इसके लिए तुलना रूप में बुराई का प्रादुर्भाव, ब्रह्म की ही इच्छा थी | अतः सृष्टि में अच्छाई व बुराई का एक सतत युद्ध चलता रहता है | 
          भारतीय धर्म संस्कृति के विरुद्ध सदैव समय समय पर आवाजें उठती रहती हैं | चूंकि यह एक गहन तात्विक एवं मानव सद-आचरण आधारित उच्च संस्कृति है अतः यह स्वाभाविक है, चाहे वह पूर्व वैदिककाल में शुक्राचार्य का विरोध एवं आसुरी विचार धारा हो या वैदिककाल में विश्वामित्र की नव-विचारधारा या पौराणिक काल में ऋषि जाबालि की नास्तिक एवं रावण की रक्ष संस्कृति, तत्पश्चात  कंस, जैन, बौद्ध, ईसाई , इस्लामिक एवं आम्बेडकर आदि की नवबौद्ध विचार धाराएं आदि |
        आजकल हमारे देश में गोंड आदिवासी दर्शन और बहुजन संस्कृति महिषासुर के नाम पर एक नवीन विरोधी विचारधारा प्रश्रय पा रही है जिसे महिषासुर विमर्श का नाम दिया जारहा है | जिसमें जहां सारे भारत में समन्वित समाज की स्थापना के साथ धर्मों व प्राचीन जातियों आदि का अस्तित्व नहीं के बरावर रह गया था, अब असुर, नाग, गोंड  आदि विभिन्न जातियों वर्णों को उठाया जा रहा है | भ्रामक विदेशी ग्रंथों आलेखों में आर्यों को भारत से बाहर से आने वाला विदेशी बताये जाने के भारत में फूट डालने वाले षडयन्त्र से भावित-प्रभावित वर्ग द्वारा  इंद्र, आदि देवों को आर्य एवं शिव व अन्य तथाकथित असुर व नाग, गोंड आदि जातियों भारत की मूल आदिवासी बताया जा रहा है | वे स्वयं को हिन्दू धर्म में मानने से भी इनकार करने लगे हैं |
       विभन्न आलेखों, कथनों, प्रकाशित पुस्तकों में उठाये गए भ्रामक प्रश्नों व विचारों, कथनों का हम एक एक करके उचित समाधान प्रस्तुत करेंगे जो ४० कथनों-समाधानों एवं उपसंहार के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, विभिन्न क्रमिक १० आलेख-पोस्टों द्वारा |

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उपसंहार -----
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कथन---महिषासुर आन्दोलन या इसके साथ आरंभ हुआ मिथकीय पुनर्पाठ का आन्दोलन कोइ छोटी सी घटना नहीं है। इसकी ऐतिहासिक दार्शनिक और धार्मिक सांस्कृतिक प्रष्टभूमि बहुत विराट है और इस एक आन्दोलन ने जिन खो गयी कड़ियों को आपस में जोड़ा है वैसा भारतीय इतिहास में बहुत कम हुआ है। अन्य शोध और मिथक अनुवाद किन्ही खो गयी परम्पराओं की दार्शनिक, धार्मिक या भाषागत समानता के आधार पर सिद्ध किये जाते रहे हैं। 
-------लेकिन पहली बार एक समाज शास्त्रीय और मानवशास्त्रीय आधार पर ठोस दार्शनिक विमर्श को केंद्र में रखने वाला आन्दोलन उभर रहा है। असुरों और गोंडों की बची हुई आबादी और उनके साथ उनकी मिथकीय कथा में शामिल अन्य दलित पिछड़ी और मूलनिवासी जातियों से एक तरह का दार्शनिक और धार्मिक सांस्कृतिक सम्बन्ध निर्मित होता दिखाई दे रहा है। और सबसे बड़ी बात ये है कि ये संबंध असल में प्राचीन भारत की सभी विद्रोही परम्पराओं को मूलनिवासी साबित करने की तरफ बढ़ रहा है।
    -------  प्राचीन भारतीय भौतिकवाद के गहन अध्ययन से लोकायतिक अर्थात प्राचीन असुरों और उनके बाद के बौद्धों के बीच में  ऐतिहासिक क्रमविकास का एक सीधा संबंध निर्मित होता दिखाई देता है। 
------यह प्रतीत होता है कि असुर या लोकायतिक या मूल सांख्य या तांत्रिक दर्शनों को मानने वाले मूलनिवासी समुदायों में ही लोकायत के रूप में एक भौतिकवादी दर्शन ने आकार लिया और संभवतः यही श्रमण परम्परा के लिए एक दार्शनिक आधार बनकर प्रकट हुआ। 
-------साथ ही इसने इस लोक’ (इहलौकिक) के सुख की प्राप्ति (चार्वाक) और इस लोक’  के दुःख की निर्जरा (बौद्ध) जैसे दर्शनों को भी ठोस भौतिकवादी आधार दिए।  
--------संभवतः यही असुर जनजातीय लोकायत (जिसके मानने वाले सुदूर लंकावासी रावण और मेघनाद आदि भी थे) और जो तन्त्र और मूल सांख्य की अपनी प्रवृत्तियों में आरंभ में अल्पविकसित था वही बाद में अपने पूर्णतः विकसित रूप बौद्ध धर्मके रूप में प्रकट हुआ।।
------- फिर संभूशेक और महिषासुर सहित असुरों की संस्कृति को छल से नष्ट किया गया और ब्राह्मणवादी धर्म में आत्मसात कर लिया गया। बाद में इसी तरीके से बुद्ध और कबीर को भी आत्मसात कर लिया गया। 
--------यह एक ऐसा सूत्र है जो प्राचीन भौतिकवाद और आधुनिक बौद्ध रहस्यवाद सहित मध्यकालीन संतों के भक्ति आन्दोलन को और उनके सनातन शत्रुओं को एकसाथ एक सीधी रेखा में बाँध देता है। 
------यह न केवल ऐतिहासिक अर्थों में उद्विकास और पतन की नयी तस्वीर को उजागर करेगा, बल्कि भविष्य में ब्राह्मणवादी पाखण्ड के शमन के लिए प्रगतिशीलों और मुक्तिकामियों सहित संपूर्ण बहुजन समाज के सभी धडों को एक साथ संगठित भी करेगा। 
--------यही अंततः एक निरीश्वरवादी प्रकृतिरक्षक मातृसत्तात्मक और इस लोकमें भरोसा करते हुए परलोक को नकारने वाले वैज्ञानिक व समतामूलक समाज की भारत में स्थापना का आधार बनेगा।

इसी पूरी विमर्श यात्रा में यह लेख तीन दावे करना चाहता है ----
---पहला यह कि देव असुर संग्राम के बहुत पहले ही आर्य और कोयावंशी गोंड संग्राम हो चुका था।
----दूसरा दावा ये कि गोंडों के संभुशेक, असुरों के महिषासुर और ब्राह्मणी धर्म के महादेव एक ही व्यक्ति या संस्था हैं व आज  के शिवया शंकरउनका विकृत व ब्राहमणीकृत रूप हैं
-----तीसरा दावा ये कि श्रमण दर्शन और पारी कुपार लिंगो का पुनेम दर्शन आपस में जुड़े हुए हैं और बहुत बाद में गौतम बुद्ध इसी पुनेम दर्शन की आरंभिक प्रवृत्तियों और मान्यताओं पर अपने विस्तृत दर्शन का भवन खड़ा कर रहे हैं। 

-------------इसी कारण महिषासुर के मिथक सहित संभूशेक, गोंडी धर्म, असुर व श्रमण व मातृसत्तात्मक या तांत्रिक या लोकायतिक दर्शनों पर और अधिक गहराई से शोध की आवश्यकता है। यह शोध बहुजन समाज की मूल संरचना और उसके ऐतिहासिक उद्विकास सहित उसके पतन की खोज है ताकि ब्राह्मणी या आर्य षड्यंत्र को उसकी सम्पूर्णता में देखा जा सके। यही शोध आज हमारी आँख के सामने चल रहे उसी सनातन षड्यंत्र को दुबारा उजागर करेगा।



समाधान -------
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—--यह सत्य-असत्य, ज्ञान-अज्ञान, अन्धकार-प्रकाश की सदा की भाँति होने वाली वैचारिक विचारधारा के युद्ध की पृष्ठभूमि है जो पुनः एक बार भारतीय भूमि पर सनातन हिन्दू वैदिक ज्ञान के विरुद्ध, वेद विरोधी अज्ञान धाराओं के उभरने का प्रयास है, सदा की भाँति पुनः मुंह की खाने के लिए |

----दावा 1. --लेखक भ्रम में हैं व इतिहास से अज्ञान---आर्य शब्द व आर्य लोग देव व असुर संग्रामों के बहुत बाद की व्यवस्था है जब देव व असुर द्वंद्व मुख्यता समाप्त हो चुके थे एवं मानव समाज में एक रूपता आगई थी | यदि कोयावंशी भारतीय आदिवासी हैं तो उनका आर्यों से संघर्ष में दूर दूर तक सत्यता नहीं |
 
---दावा २.----संभु सेक व महादेव तो निश्चय ही एक ही हैं जो भारतीय समाज के विकास की अवस्थाओं में हैं | जैसा की ऊपर कथनों में स्पष्ट किया जा चुका है की संभुसेक, या हरप्पा-पूर्व व हरप्पा  सभ्यता के पशुपति ---महा मानवीय समन्वय के बाद में सरस्वती सभ्यता व वैदिक सभ्यता के शिव व् महादेव ही हैं,जिन्हें देवाधिदेवस्वीकारा गया | यह आदि संभुसेक का विकृत नहीं अपितु विक्सित, उन्नत रूप है जिसे वैदिक धर्म के साथ विश्वभर में पूज्य के रूप में स्वीकारा गया | हिन्दू धर्म में महादेव के नामों में एक नाम शंभू, भोला, भी है |
---हाँ महिषासुर, महादेव नहीं हैं, वह एक असुर सम्राट था | अन्यथा उसका शिव पत्नी पार्वती द्वारा क्यों वध किया जाता | यह निश्चय ही इतिहास व तार्किकता की अज्ञानता प्रदर्शन है |
 
----दावा ३.---निश्चय ही ये सारे वर्णित दर्शन या धर्म आपस में जुड़े हुए हैं, क्योंकि ये सभी प्रारम्भिक, अविकसित अवस्था के आरंभिक प्रवृत्तियों और मान्यताओं से सम्बद्ध हैं तथा  समय समय पर वेदों की विक्सित, उन्नत ईश्वरवादी एवं उनकी मानव आचरण शुचिता भावना के विरुद्ध उभरे हुए लोकायत या अनीश्वरवादी दर्शन हैं |


  --------        समतामूलक समाज क्या है, समता का क्या अर्थ है ? समता, समानता नहीं है | समता का अर्थ है सबको यथायोग्य मिले न कि सबको समान मिले | इसमें न निरीश्वरवादी, प्रकृतिरक्षक, मातृसत्तात्मक, केवल लोक पर भरोसे की लोकायत संस्था / दर्शन से अंतर पड़ता है; न ईश्वरवादी, पितृसत्तात्मक, लोक-परलोक वादी दर्शन/ संस्था से ---दोनों ही दर्शनों के साथ मानवतावादी व्यवहारिक तत्व होना चाहिए | यही सुनिश्चित जीवन दर्शन एवं  सत्य है |
        क्योंकि भौतिकवादी लोकायत दर्शन में मनुष्य स्वयं ही प्रत्येक कार्य का विचारक, निश्चितकारक एवं कर्ता होता है अतः अहंकारग्रस्त होकर विनाश की ओर चल पड़ने का अधिक संभावना होती है | ईश्वरवादी दर्शन में मानव केवल कर्ता है कारक नहीं, सब कुछ ईश्वर या प्रकृति के हाथ में है अतः प्रायः अहंग्रस्तता की संभावना नहीं होती |
        इतिहास गवाह है कि इस देश-दुनिया में सदैव ही समय समय पर लोकायत दर्शन प्रादुर्भूत होता रहा है, चाहे वह असुर हों, या रावण, कंस, जावालि मुनि, जैन, बुद्ध, पाश्चात्य दर्शन परन्तु सदैव ही, सभी कुछ समय के उपरांत समाप्त होगये, विलीन होगये या ईश्वरीय वैज्ञानिक वैदिक-वेदान्त दर्शन में समन्वित होगये, जो वैचारिक विकास के क्रम में सर्वोपरि, वैज्ञानिक एवं मानवतावादी व्यवहारिक सर्वश्रेष्ठ दर्शन है |
पशुपति-हरप्पा सील
अर्धनारीश्वर


पशुपति व मातृदेवी -हरप्पा सील
ब्रह्मा विष्णु महादेव --त्रिदेव ( मानव जाति का महा समन्वय )


अफगानिस्तान में शिव


                                                             ---इति---
 
कथन सन्दर्भ जिसका समाधान किया गया --
--------आलेख -- महिषासुर विमर्श : गोंड आदिवासी दर्शन और बहुजन संस्कृति Sanjay Jothe संजय जोठे On July 3, 2017


 

सोमवार, 16 अप्रैल 2018

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट--नवम --डा श्याम गुप्त


                            

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट--नवम --डा श्याम गुप्त
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----पूर्वा पर ----
                          आजकल हमारे देश में गोंड आदिवासी दर्शन और बहुजन संस्कृति व महिषासुर के नाम पर एक नवीन विरोधी विचारधारा प्रश्रय पा रही है जिसे महिषासुर विमर्श का नाम दिया जारहा है | जिसमें जहां सारे भारत में समन्वित समाज की स्थापना के साथ धर्मों व प्राचीन जातियों आदि का अस्तित्व नहीं के बरावर रह गया था, अब असुर, नाग, गोंड आदि विभिन्न जातियों वर्णों को उठाया जा रहा है |
भ्रामक विदेशी ग्रंथों आलेखों में आर्यों को भारत से बाहर से आने वाला विदेशी बताये जाने के भारत में फूट डालने वाले षडयन्त्र से भावित-प्रभावित वर्ग द्वारा इंद्र, आदि देवों को आर्य एवं शिव व अन्य तथाकथित असुर व नाग, गोंड आदि जातियों भारत की मूल आदिवासी बताया जा रहा है | वे स्वयं को हिन्दू धर्म में मानने से भी इनकार करने लगे हैं |
-----------------विभन्न आलेखों, कथनों, प्रकाशित पुस्तकों में उठाये गए भ्रामक प्रश्नों व विचारों, कथनों का हम एक एक करके उचित समाधान प्रस्तुत करेंगे जो ४० कथनों-समाधानों एवं उपसंहार के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, विभिन्न क्रमिक आलेख-पोस्टों द्वारा |

-------पोस्ट नवम---- कथन ३५ से ३९ तक---


कथन ३५-- 
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        संभूशेक और गणपति कोई एक व्यक्ति नहीं हैं। गोंडी पूनेम दर्शन में अट्ठासी संभुशेकों का उल्लेख है। इसी तरह ऋग्वेदिक व पौराणिक उल्लेखों में बहुत सारे गणेश या गणपति पाए जाते हैं। ये दोनों चरित्र असल में व्यक्ति नहीं बल्कि पदवियां हैं| इसी से एक अन्य गहरा संकेत मिलता है वो ये कि संभूशेक और गणपति का महादेव और विघ्नहर्ता के रूप में बचे रहना असल में व्यक्तियों का नहीं बल्कि संस्थाओं का बचे रहना है।
       संभू शेक शब्द संभू मा-दावके रूप में भी जाना जाता है। संभू मा-दावका अर्थ है संभू हमारा पिता। डॉ. कंगाली के अनुसार यही संभू मा-दाव बाद में ब्राह्मणों का शंभू महादेवबन जाता है। ऐसे अट्ठासी संभू  शेक हुए हैं जिनके अलग अलग नाम हैं। ये सभी अपनी पत्नियों के साथ बतलाये गए हैं और इनके कुछ नाम इस प्रकार हैं: संभू-मूला,संभू-गोंदा,संभू-मूरा,संभू-सैया,संभु-गवरा इत्यादि। यहाँ अंतिम तीन नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। जो इस प्रकार हैं संभू-सती, संभू-गीरजा
       संभूशेक श्रृंखला में संभू-पार्बती अंतिम जोड़ी थी और इन्ही के दौर में एशिया माइनर के विदेशी आर्यों ने हमला करना शुरू किया था। संभूशेक को कूटनीति से अपने वश में करने हेतु आर्यों ने दक्ष कन्या पार्वती को इस्तेमाल किया। उसे अनेक प्रकार के नशीले द्रव्यों का आदि बनाया गया। भोले संभू आर्यों की कूटनीति को समझ नहीं पाए। संभू शेक पार्वती के मोहजाल में फंसकर सुप्त अवस्था में पहुँच गए– (Kangali 2011:14)[25].
        संभुशेक एक सिद्ध योगी और महाशूरवीर योद्धा थे जिनकी अनुमति से कोई भी उनके प्रदेश में दाखिल नहीं हो सकता था। उन्हें हराने के लिए आर्यों ने दक्ष पुत्री पार्वती को भेजा लेकिन वह पार्वती स्वयं ही संभुशेक की शिष्या बन गयी। इसी समय कोयवंशी गोंडों और आर्यों में भयानक युद्ध चल रहा था जिसमे आर्यों को कड़ी टक्कर मिल रही थी। युद्ध के किसी मोड़ पर आर्यों के प्रतिनिधि इंद्र ब्रह्मा और विष्णु मिलकर गोंडों के प्रतिनिधि संभुशेक के सामने समझौते का प्रस्ताव लेकर जाते है।
समाधान ३५---
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           एक तरफ कहा जाता है कि गोंडी नेता शंभू-पार्वती अंतिम जोड़ी थी दूसरी ओर आर्यों ने दक्ष कन्या पार्वती को भेजा | यह पूरी तरह से भ्रामक विचार व तथ्यों की प्रस्तुति है | पार्वती दक्ष पुत्री नहीं अपितु हिमवान की पुत्री थी,शिव की द्वितीय पत्नी |  प्रथम पत्नी दक्ष कन्या सती थी | ये सारी घटनाएँ शिव के कैलाश पर चलेजाने के बाद की हैं| अर्थात समाधान ३४ में स्पष्ट किया गया मानव जाति का महासमन्वय के पश्चात की बातें हैं| कथित समझौते के प्रस्ताव की बात भी इसी और इंगित करती है |
    यदि शम्भू सेक सिद्ध योगी थे तो वे आर्यों की कूटनीति क्यों नहीं समझ पाए, पार्वती के जाल में व नशीले दृव्यों में कैसे फंस गए | वस्तुतः ये सब झूठी कपोल कल्पित बातें हैं | शिव महान योगी थे एवं कुशल योद्धा के साथ महान आपसी समन्वयक जैसा हम पहले ही बता चुके हैं|
     यह कोई नयी बात नहीं है, शंभू सेक या शिव, गणेश-गणपति पद व संस्थाएं ही रही हैं वैदिक समाज में भी गण व गणपति थे | इसी प्रकार इंद्र भी एक पदवी है, ये संस्थाएं हैं, ब्रह्मा, मनु, प्रजापति आदि की भाँति.. भारतीय समाज के उन्नत होने के साथ साथ की अवस्थाएं हैं | 
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कथन ३६--- 
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एक त्यौहार जो खडेयारा पंदुम या गढ़ पूजाया मेघनाद पूजा कहलाता है। इस त्यौहार के बारे में गोंडी मान्यता है कि मेघनाद रावण (कोयावंशी गोंडों के रावेन) के प्रतापी पुत्र थे जो दाई कली कंकाली के भक्त थे और निशस्त्र होकर एकांत में उनकी पूजा करते थे। इसी पूजा के दौरान राम और लक्षण नामक आर्य योद्धाओं ने उन्हें छलपूर्वक मारा था। यह कथा ब्राह्मणी हिन्दू साहित्य में भी पायी जाती है जिसपर वे गर्व करते हैं। आज भी गोंड समुदाय के गीतों में पूरी घटना दोहराई जाती है। हिन्दू मिथकों में भी जिस प्रकार से रावण का वर्णन है वह शिव अर्थात संभूशेक के महान भक्त बताये गए हैं और उनके चक्रवर्ती पुत्र मेघनाद कली कंकाली का रूप मानी जाने वाली महाकाली के भक्त हैं।  

समाधान ३६ ----
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        रावण असुर नहीं था अपितु ऋषिपुत्र व ब्राह्मण था वह असुरों के पराभव के बहुत बाद में हुआ था |   जब सारे असुर हार कर पाताल में चले गये उसके बहुत वर्षों बाद राक्षस राज रावण ने पुनः दैत्यों व असुरों को एकत्र करना प्रारम्भ किया था परन्तु वे सब भी आपस में युद्ध रत थे |हाँ रावण महादेव का व मेघनाद देवी के महान भक्त थे|
      यदि उसे गोंड–रावेन का वंशज व समकालीन  माना जाय तो स्वयं गोंड लोग भारत के आदि-आदिवासी नहीं ठहरते | घटना सही है परन्तु उसका गोंडों के सम्बन्ध से कुछ लेना देना नहीं है | 

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कथन-३७----
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प्राचीन हड़प्पा की सील में सात देव और संभुशेक सहित अन्य टोटम
समाधान-३७----
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 ---वास्तव में यह मातृसत्तात्मक दृश्य है जिसमें  शंभू सेक ( या आदि शिव) आदि-मातृशक्ति के सम्मुख नत व भेंट प्रदान करते दिखाया गया है उनके पीछे उनका वाहन वृषभ नंदी है एवं सामने आदिशक्ति के रक्षक-कृतित्वकारिका रूप सप्त-मातृकाएं हैं |
कथन-३८ ----
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         अब इतने विमर्श और विश्लेषण के बाद असुरों (मूलनिवासियों/आदिवासियों), कोयवंशीय गोंडों, बौद्धों कबीरपंथियों और रैदासियों में एक दार्शनिक एकता स्थापित हो जाती है। इस बात को न सिर्फ भारतीय दर्शन, रहस्यवाद या मिथक के जरिये बल्कि समाज क्रान्ति की जमीनी लड़ाइयों के मद्देनजर भी समझा जा सकता है।
        जिन लोगों ने आधुनिक समय में ऐसे सामाजिक आंदोलनों को समझने का प्रयास किया है वे भी बहुत स्पष्टता से बतलाते हैं कि कबीर असल में बुद्ध की ही क्रान्ति परम्परा में हैं। मध्य प्रदेश के मालवा निमाड़ क्षेत्र में कबीरपंथ का गहराई से अध्ययन करने वाली प्रोफेसर लिंडा हेस ने स्पष्ट किया है कि कबीर की वेद विरुद्ध क्रान्ति असल में बुद्ध की क्रान्ति से अनिवार्य रूप से जुडती है --- Hess, 2002)। इसी तरह गेल ओमवेट भी बतलाती हैं कि अन्य स्कालर्स ने जो काम किया है, जैसे कि एलियानोर जोलियेट और ए. एच. सालुंखे, उनकी रिसर्च आगे चलकर चोखामेला और तुकाराम को भी विद्रोही बौद्ध क्रान्ति के अधिक नजदीक बतलाती है।
     आचार्य मेधार्थी की प्रस्तावना यह थी कि संत धर्म इस देश का मूल धर्म था जो कि समता सहयोग और बंधुत्व पर आधारित था प्राचीन काल में जिसे सनातन धर्म कहा जाता है वह असल में संत धर्म था। इस तर्क से चलते हुए वे आगे बौद्ध धर्म के साथ संत धर्म की एकता सिद्ध करने का प्रयास करते हैं और इस क्रम में वे ये भी कहते हैं कि बुद्ध ने जीवन भर जो भी सिखाया वो असल में संत धर्म की ही शिक्षाएं थी
    इस प्रकार अंबेडकर के पूर्व भी अछूत और मूलनिवासी चिंतकों में बौद्ध धर्म के प्रति एक स्वागत का भाव निर्मित हो चुका था इसीलिये डॉ. अंबेडकर द्वारा 14 अक्टूबर 1956 को बौद्ध धर्म के स्वीकार का इतना व्यापक असर हुआ, कानपूर में न केवल कईयों ने बौद्ध धर्म को अपनाया और भविष्य में आजीवन बुद्ध के सन्देश के लिए समर्पित हो गए, बल्कि उन्होंने हिन्दू धर्म के देवी देवताओं को भी 22 मंदिरों से निकाल बाहर किया और उन्हें बुद्ध के मंदिरों में रूपांतरित कर दिया (Linch, 1969)इसीलिये कई दलित चिन्तक रविदास को बौद्ध धर्म से प्रेरित संत बतलाते हैं (Zelliot Mokashi-Punekar 2005)
    इसीलिये रविदास और कबीर को आधार बनाकर बुद्ध के चिन्तन में आश्रय पाने वाली धाराएं अंततः बुद्ध को ही रविदास और कबीर की क्रान्ति का स्त्रोत सिद्ध करती हैं और बुद्ध के इस लोकवादीदर्शन को महिमामंडित करती हैं।
समाधान ३८---- 
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         ये सारे विदेशी शोधकर्ता ही जड़ हैं सारे फसाद की,  झूठ व निरर्थक शोध जिनके बारे में वे कभी जान ही नहीं सकते उनके बारे में भ्रामक तथ्यों को दिखाकर  हिन्दू सनातन धर्म को तोड़ने की साज़िश के -- --------अंग्रेज़ी की गुलामी परम्परा के वाहक ये लोग अब भी उन्हें अपना आका मानते हैं |
------जब कबीर- झीनी झीनी बीनी रे चदरिया.. कहते है,...एक तत्व गुण तीनी रे...तो वे औपनिषदिक तत्वज्ञान, वैदिकज्ञान पर कह रहे होते हैं | जब रैदास –गाते हैं—प्रभुजी तुम चन्दन हम पानी ---तो वे भौतिकवाद नहीं ईश्वरवाद की बात कर रहे होते हैं| संत कवि सभी ईश्वरीय वेदान्त परम्परा के हैं नकि लोकायत, अनीश्वरवादी परम्परा के

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कथन-३९---
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        अब हम महिषासुर आन्दोलन और इसके साथ आरम्भ हुए मिथकीय पुनर्पाठ को उसके व्यापक और सही सन्दर्भ में देख सकते हैं। महिषासुर आन्दोलन ऊपर बतलाई गयी विराट दलदल में सतह पर नजर आने वाला एक महत्वपूर्ण सबूत है जिसके सहारे अन्य सभी परम्पराओं के उदविकासीय संघर्ष और षड्यंत्रों को भी देखा जा सकता है। 
-------अभी तक जो साक्ष्य और तथ्य महिषासुर के संबंध में हैं वे मूलतः मिथकीय विवरणों और बंगाल, उड़ीसा, झारखंड इत्यादि में फैले मूलनिवासी व असुर समुदाय की लोक कहावतों और किंवदंतियों सहित उनके पूजा विधानों के विश्लेषण पर आधारित हैं। यह एक महत्वपूर्ण बात है। ----------इसका यह अर्थ हुआ कि आज भी छोटा नागपुर के असुरों में या उत्तरप्रदेश के महोबा जिले के महिषासुर मंदिर के आसपास के या छतीसगढ़ और झारखंड के अनेक मूलनिवासी समुदायों में महिषासुर एक सच्चाई हैं। 
--------महिषासुर न केवल इनके लिए एक प्रतापी राजा, पूर्वज और मिथकीय चरित्र हैं बल्कि वे एक महाशक्तिशाली शूरवीर भी रहे हैं। कई जनजातीय समाजों में आज भी महिषासुर की पूजा की जाती है। झारखंड के असुर स्वयं को महिषासुर का वंशज मानते हैं और महिषासुर सहित, मेघनाद, रावण और अन्य असुर  माने जाने वाले वीरों की पूजा करते हैं।
समाधान-३९---
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        निश्चय ही जैसे आज भी कुछ लोग पाकिस्तान भक्त देशद्रोही मुस्लिमों, सेना पर पत्थर फैंकने वाले जम्मू-कश्मीरियों, रूस-चीनी भक्त कम्युनिस्टों की प्रसंशा करते दिखाई देते हैं वैसे ही यह भी है आज भी महिषासुर, रावण,मेघनाद आदि की पूजा करते हुए दिखाई देते हैं तो कोइ आश्चर्य की बात नहीं | वीर तो वे थे ही परन्तु भटके हुए | कुछ न कुछ को हारने या नष्ट होने वाली पार्टी के पक्षधर होते ही हैं, इससे उनके कार्य उचित थोड़े ही होजाते हैं |


  -------------क्रमश पोस्ट १०------ उपसंहार ----------