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गुरुवार, 17 अगस्त 2017

'नवसृजन' साहित्यिक संस्था का नवाँ वार्षिकोत्सव---डा श्याम गुप्त को 'साहित्याचार्य '.की उपाधि



श्रीमती उषा सिन्हा जी को माल्यार्पण करती हुई सुषमा गुपता
                        


                             दिनांक 13/08/2017 को राजधानी की प्रसिद्धि 'नवसृजन' साहित्यिक संस्था का नवाँ वार्षिकोत्सव मनाया गया जिसमें प्रतिवर्ष दिए जाने वाले वार्षिक सम्मान --वरिष्ठ कवि श्री कुमार तरल जी को -सृजन साधन वरिष्ठ रचनाकार सम्मान व मुकेश कुमार मिश्रा को सृजन साधना युवा रचनाकार सम्मान 2017 प्रदान किया गया।
\
विशिष्ट सम्मान में--साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य को 'साहित्याचार्य श्री ' एवं डा श्याम गुप्त को 'साहित्याचार्य '.की उपाधि से सम्मानित किया गया |
'
-----समारोह के अध्यक्ष आदरणीय रंगनाथ मिश्र सत्य ,मुख्य अतिथि सेवा निवृत्त पुलिस महानिदेशक व साहित्यकार श्री महेश चन्द्र द्विवेदी जी,विशिष्ट अतिथि पूर्व भाषा विज्ञान की विभाग अध्यक्ष प्रोफेसर ऊषा सिन्हा जी व पूर्व सदस्य योजना आयोग भारत सरकार डाक्टर सुल्तान शाकिर हाशमी जी थे।
कार्यक्रम का संचालन युवा कवि श्री देवेश द्विवेदी 'देवेश' जी ने किया ।इस अवसर पर सीवान बिहार से आये वरिष्ठ कवि श्री परमहंस मिश्र प्रचंड जी सहित लखनऊ व आसपास के लगभग एक सौ कवि गण उपस्थिति रहे।

--------वाणी वन्दना श्रीमती सुषमा गुप्ता व वाहिद अली वाहिद ने की \
\
इस अवसर पर डा योगेश गुप्त द्वारा संपादित साझा काव्य संकलन -श्रृंगिनी -का विमोचन भी हुआ जिसमें युवा कवियों-मुकेश कुमार मिश्रा , मनु बाजपेयी ,लव परवाना,विशाल मिश्र ,अनूप शुक्ल ,देवेश द्विवेदी व सम्पादक डाॅ. योगेश गुप्त जी की रचनाएँ शामिल हैं ।
---छोटी छोटी बच्चियों द्वारा मनमोहक नृत्य में गजानन वन्दना प्रस्तुत की गयी |
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पुस्तक शृंगिनी का लोकार्पण
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डा रंगनाथ मिश्र सत्य को साहित्याचार्य श्री व डा श्याम गुप्त को साहित्याचार्य की उपाधि



 


मंगलवार, 15 अगस्त 2017

श्रीकृष्ण--त्रिगुणात्मक प्रकृति से प्रकट होती चेतना सत्ता---डा श्याम गुप्त...



   


कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष------
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श्रीकृष्ण--त्रिगुणात्मक प्रकृति से प्रकट होती चेतना सत्ता---
\
श्रीकृष्ण आत्मतत्व के मूर्तिमान रूप हैं। मनुष्य में इस चेतन तत्व का पूर्ण विकास आत्मतत्व का जागरण है। जीवन त्रिगुणात्मक प्रकृति सत रज व तम से उद्भूत और विकसित होता है प्रकृति का तमस तत्व चेतन-तत्व के विकास को रोकने का प्रयास करता है |
\
-----तीन माताएं-----
त्रिगुणात्मक प्रकृति के रूप में श्रीकृष्ण की तीन माताएँ हैं।
१.रजोगुणी प्रकृति रूपा देवकी जो जन्मदात्री माँ हैं व सांसारिक माया गृह में कैद हैं।
२.सतोगुणी प्रकृति रूपा माँ यशोदा हैं, जिनके वात्सल्य -प्रेम रस को पीकर श्रीकृष्ण बड़े होते हैं।
३.इनके विपरीत एक घोर तमस रूपा प्रकृति भी शिशु-भक्षक सर्पिणी के समान पूतना माँ है, जिसे आत्मतत्व का प्रस्फुटित अंकुरण नहीं सुहाता और वह वात्सल्य का अमृत पिलाने के स्थान पर विषपान कराती है।
---------संदेश है कि प्रकृति का तमस तत्व चेतन-तत्व के विकास को रोकने में असमर्थ है।
\
------गोकुल -----
शब्द का अर्थ इंद्रियाँ भी हैं, गोकुल का अर्थ है हमारी पंचेद्रियों का संसार और
------- वृन्दावन का अर्थ है वृन्द जन जन की वाटिका, जन जन का मन और
------- तुलसीवन अर्थात मन का उच्च गतिमय क्षेत्र तुर, तुरय, तुरंत तुरस, तुलसी |
-----इन्हीं में पूतना वध, शकट भंजन और तृणावर्त वध का तथा वृंदावन में बकासुर, अधासुर और धेनुकासुर आदि अनेक राक्षसों के हनन का वर्णन है जो मानव मन की अतीन्द्रिय क्षमता का उपाख्यान रूप है |

----- गोवर्धन धारण, गो अर्थात इंद्रियों का वर्धन - पालन पोषण आदि आर्थिक, नीति-परक और राजनीतिक व्याख्याएं हैं। आध्यात्मिक संकेत है कि इंद्रियों में क्रियाशील प्राण-शक्ति के स्रोत परमेश्वर पर हमारी दृष्टि होना चाहिए।
\
----- रासलीला----
इसी प्रकार गोपियों के साथ रासलीला के वर्णन में मन की वृत्तियां ही गोपिकाओं के रूप में मूर्तिमान हुई हैं और प्रत्येक वृत्ति के रासलीला या रस-नृत्य के रूप में सराबोर होने का चित्रण है। इससे भी उच्च अवस्था का प्रेम व विरह का वर्णन महारास है | यह द्वैत का एक आंतरिक आनंद में समाहित हो जाने की चित्रण है |
-------कंस -----
श्रीकृष्ण को किशोर वय होने पर कंस उन्हें मरवा डालने का एक बार फिर षड्यंत्र रचकर मथुरा बुलवाता है, किंतु श्रीकृष्ण उसको उसके महाबली साथियों सहित मार डालते हैं। कंस देहासक्ति का मूर्तिमान रूप है, जो संभावित मृत्यु से बचने के लिए कितने ही कुत्सित कर्म करता है।
---------मथुरा देहासक्ति से विक्षुब्ध मन है ।
----द्वारिका-----
द्वारिका शब्द में द्वार का अर्थ है साधन, उपाय या प्रवेश मार्ग। समुद्र व्यक्तित्व के गहरे तल- आत्म क्षेत्र को इंगित करता है। अतः आत्म क्षेत्र का प्रवेश द्वार है द्वारिका
-------कंस वध करने के उपरांत द्वारिका में राज्य स्थापना करने का अर्थ है कि आत्मभाव में प्रवेश के पूर्व देहासक्ति की समाप्ति आवश्यक है। इस क्षेत्र में चेतना का प्रवेश होने पर जीवन जीने का जैसा स्वरूप होगा, उसका निरूपण द्वारिका पर श्रीकृष्ण राज्य के रूप में किया गया है। इस क्षेत्र का परिचय महाभारत में श्रीकृष्ण के लोकहितार्थ और धर्मस्थापनार्थ किए गए कार्यों द्वारा तथा गीता के अंतर्गत उनकी वाणी द्वारा किया गया है।
------- व्यक्ति भी संकल्प करे तो उसकी चेतना भी कृष्ण की भांति विकसित हो सकती है।
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-------- श्री  अर्थात राधा, आदिशक्ति, प्रकृति से सदा सर्वदा सायुज्य श्रीकृष्ण जिनका नाम है, गोकुल जिनका धाम है ऐसे पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण को बारम्बार प्रणाम |

सोमवार, 14 अगस्त 2017

श्याम सवैया छंद--- निज हाथ में प्यारा तिरंगा उठाए--डा श्याम गुप्त....

                                   भारत जैसे विश्व के प्राचीनतम देश जो विश्व में अग्रणी देश था , उसकी गौरव गाथा आज हम व हमारी वर्त्तमान पीढ़ी भूल चुकी है , अतः वर्त्तमान पीढ़ी में देशभक्ति के गौरव को , स्वाभिमान को जगाना इस कविता का उद्देश्य है... इसके कण कण में शौर्य की गाथाएं भरी हुई हैं , कण कण में इतिहास में ज्ञान का भण्डार है , फिर भी यह देश शान्ति का पुजारी है ...इस युग में भी भारत विश्व गुरु बनाने को तैयार है....
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प्रस्तुत है --श्याम सवैया छंद ---
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भारत माता ----
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भाल रचे कंकुम केसर, निज हाथ में प्यारा तिरंगा उठाए।
राष्ट्र के गीत बसें मन में,उर राष्ट्र के गान की प्रीति सजाये।
अम्बुधि धोता है पांव सदा,नैनों में विशाल गगन लहराये।
गंगा जमुना शुचि नदियों ने,मणि मुक्ताहार जिसे पहनाये।
है सुन्दर ह्रदय प्रदेश सदा, हरियाली जिसके मन भाये।
भारत मां शुभ्र ज्योत्सिनामय,सब जग के मन को हरषाये॥
-२-
हिम से मंडित इसका किरीट,गर्वोन्नत गगनांगन भाया ।
उगता जब रवि इस आंगन में,लगता है सोना बरसाया ।
मरुभूमि व सुन्दरवन से सजी, दो सुन्दर बांहों युत काया ।
वो पुरुष-पुरातन विन्ध्याचल,कटि-मेखला बना हरषाया ।
कण-कण में शूरवीर बसते,नस-नस में शौर्य भाव छाया ।
हर तृण ने इसकी हवाओं के,शूरों का परचम लहराया ।
-३-
इस ओर उठाये आंख कोई,वह शीश न फ़िर उठपाता है ।
वह द्रष्टि न फ़िर से देख सके,इस पर जो द्रष्टि गढाता है ।
यह भारत प्रेम -पुजारी है, जग -हित ही इसे सुहाता है ।
हम विश्व-शान्ति हित के नायक,यह शान्ति दूत कहलाता है।
यह विश्व सदा से भारत को, गुरु जगत का कहता आता है।
इस युग में भी यह ज्ञान-ध्वजा,नित-नित फ़हराता जाता है।।
-४-
इतिहास बसे अनुभव-संबल,मेधा-बल,वेद-रिचाओं में।
अब रोक सकेगा कौन इसे,चलदिया आज नव-राहों में।
नित नव तकनीक सजाये कर,विज्ञान का बल ले बाहों में।
नव ज्ञान तरंगित इसके गुण,फ़ैले अब दशों दिशाओं में।
नित नूतन विविध भाव गूंजें,इसकी नव कला-कथाओं में।
ललचाते देव मिले जीवन, भारत की सुखद हवाओं में ॥
Comment

रविवार, 13 अगस्त 2017

कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर दो पद----- डा श्याम गुप्त





कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर दो पद-----
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१.
ब्रज की भूमि भई है निहाल |
सुर गन्धर्व अप्सरा गावें नाचें दे दे ताल |
जसुमति द्वारे बजे बधायो, ढफ ढफली खडताल |
पुरजन परिजन हर्ष मनावें जनम लियो नंदलाल |
आशिष देंय विष्णु शिव् ब्रह्मा, मुसुकावैं गोपाल |
बाजहिं ढोल मृदंग मंजीरा नाचहिं ब्रज के बाल |
गोप गोपिका करें आरती, झूमि बजावैं थाल |
आनंद-कन्द प्रकट भये ब्रज में विरज भये ब्रज-ग्वाल |
सुर दुर्लभ छवि निरखे लखि-छकि श्याम’ हू भये निहाल ||


 
२.
तेरे कितने रूप गोपाल ।
सुमिरन करके कान्हा मैं तो होगया आज निहाल ।
नाग-नथैया, नाच-नचैया, नटवर, नंदगोपाल ।
मोहन, मधुसूदन, मुरलीधर, मोर-मुकुट, यदुपाल ।
चीर-हरैया, रास -रचैया, रसानंद, रस पाल ।
कृष्ण-कन्हैया, कृष्ण-मुरारी, केशव, नृत्यगोपाल |
वासुदेव, हृषीकेश, जनार्दन, हरि, गिरिधरगोपाल |
जगन्नाथ, श्रीनाथ, द्वारिकानाथ, जगत-प्रतिपाल |
देवकीसुत,रणछोड़ जी,गोविन्द,अच्युत,यशुमतिलाल |
वर्णन-क्षमता कहाँ 'श्याम की, राधानंद, नंदलाल |
माखनचोर, श्याम, योगेश्वर, अब काटो भव जाल ||
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----चित्र गूगल साभार




शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

ज़िन्दगी--गज़ल ---डा श्याम गुप्त



ज़िन्दगी--गज़ल
राहों के रंग न जी सके, कोई ज़िन्दगी नहीं।
यूहीं चलते जाना दोस्त, कोई ज़िन्दगी नहीं।

कुछ पल तो रुक के देख ले, क्या क्या है राह में,
यूहीं राह चलते जाना कोई ज़िन्दगी  नहीं।

चलने  का कुछ तो अर्थ हो, कोई मुकाम हो,
चलने के लिये चलना कोई ज़िन्दगी नहीं।

कुछ खूबसूरत से पडाव, यदि राह में हों,
उस राह चलते जाना कोई ज़िन्दगी नहीं।

ज़िन्दा दिली से ज़िन्दगी को जीना चाहिये,
तय रोते सफ़र करना कोई ज़िन्दगी  नहीं।

इस दौरे भागम भाग में, सिज़दे में प्यार के,
दो पल झुके तो इससे बढकर बन्दगी नहीं।

कुछ पल ठहर हर मोड पे, खुशियां तू ढूंढ ले,
उन पल से बढ के श्याम कोई ज़िन्दगी नहीं॥

३० वर्ण की दो घनाक्षरी-----सूर घनाक्षरी...व श्याम-घनाक्षरी....डा श्याम गुप्त ...


                      

३० वर्ण की दो घनाक्षरी-----सूर घनाक्षरी...व श्याम-घनाक्षरी.......

 
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१. श्याम-घनाक्षरी, ...वर्ण- १६-१४ ..८ ८, ७ ७ पर यति, अंत में तीन गुरु (sss मगण)--
\
बहु भांति पुष्प खिलें, कुञ्ज क्यारी उपवन,
रंग-विरंगी ओढे, धरन रजाई है |
केसर अबीर रोली, कुंकुंम, मेहंदी रंग,

घोल के कटोरों में, भूमि हरषाई है |
फैलि रहीं चहुँ ओर, लता मनमानी किये,
द्रुम चढीं शर्मायं, मन मुसुकाई हैं |
तिल मूंग बादाम के, लड्डू घर घर बनें ,
गज़क मंगोड़ों की, बहार सी छाई है ||
\

२.सूर घनाक्षरी --३० वर्ण, चरणान्त लघु या गुरु, ८ ८, ८ ६ पर यति – ISS यगण)
\
थर थर थर थर, कांपें सब नारी नर,
आई फिर शीत ऋतु, सखि वो सुजानी |
सिहरि सिहरि उड़े, जियरा पखेरू सखि,
उर मांहि उमंगाये, पीर वो पुरानी |
बाल वृद्ध नारी नर, धूप बैठे तापि रहे,
धूप भी है कुछ खोई, सोई अलसानी |
शीत की लहर तीर, भांति तन बेधि रही,
मन उठै प्रीति की वो, लहर अजानी ||

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

श्याम स्मृति-१२६. --- काव्य -- मानवीय सृजन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण – डा श्याम गुप्त

-----श्याम स्मृति-१२६. ---
*****काव्य -- मानवीय सृजन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण – ***
-------- काव्य मानव-मन की संवेदनाओं का बौद्धिक सम्प्रेषण है--मानवीय सृजन में सर्वाधिक कठिन व रहस्यपूर्ण ; क्योंकि काव्य अंतःकरण के अभी अवयवों ---चित्त (स्मृति व धारणा ), मन ( संकल्प ), बुद्धि ( मूल्यांकन ), अहं ( आत्मबोध ) व स्वत्व (अनुभव व भाव ) आदि सभी के सामंजस्य से उत्पन्न होता है | तभी वह युगांतरकारी, युगसत्य, जन सम्प्रेषणीय, विराट-सत्याग्रही, बौद्धिक विकासकारी व सामाजिक चेतना का पुनुरुद्धारक हो पाता है |
---------काव्य--- इतिहास, दर्शन या विज्ञान के भांति कोरा कटु यथार्थ न होकर मूलरूप से वास्तविक व्यवहार जगत के अनुसार सत्यं, शिवं, सुन्दरं होता है, तभी उसका कथ्य युगानुरूप के साथ सार्वकालिक सत्य भी होता है|
---------साहित्यकार का दायित्व- नवीन युग-बोध को सही दिशा देना होता है तभी उसकी रचनाएँ कालजयी हो पाती हैं| आधुनिक व सामयिक साहित्य रचना के साथ-साथ ही सनातन व एतिहासिक विषयों पर पुनः-रचनाओं द्वारा समाज के दर्पण पर जमी धूलि को समय-समय साफ़ करते रहने से समयानुकूल प्रतिबिम्ब नए-नए भाव-रूपों में दृश्यमान होते हैं एवं प्रगति की भूमिका बनते हैं|

भारत ७० साल का होगया है - डा श्याम गुप्त

                               

                       

१.भारत ७० साल का होगया है -----एक समाचार , हिन्दुस्तान----
----हम भूल जाते हैं कि यह देश -जो भारत है - का जन्म १९४७ में नहीं हुआ ,अपितु लाखों वर्ष प्राचीन यह देश सृष्टि का आदि देश है , १९४७ में तो यह विदेशियों की गुलामी से स्वतंत्र हुआ था ---अतः पुनः स्वतंत्रता का ७०वा साल है |
--------हम, हमारा मीडिया कब अपना दायित्व समझेंगे ---अपनी भावी पीढी के समुचित मार्गदर्शन का -----



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बुधवार, 9 अगस्त 2017

रिश्ता सारमेय सुत का.-----..डा श्याम गुप्त की कहानी ----

रिश्ता सारमेय सुत का.-----..डा श्याम गुप्त की कहानी ----
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कालू कुत्ते ने झबरीली कुतिया का गेट खटखटाया और बोला,-
'भौं .s.s.भौं ऊँ भुक -अरे कोई है। '
झबरीली ने गेट की सलाखों के नीचे से झांका और गुर्राई, 'भूं ऊँ ऊँ भौं, कौन है ?'
भूं s भुक , मैं कालू ।
ओ s sभूं अक , क्या है, क्यों आये हो?
\
                 रिश्ता लाया हूँ , कालू बोला,मेरी बेटी शरवती की आपके झबरू बेटे के साथ जोड़ी अच्छी रहेगी। क्या ख्याल है। झबरू भी शरबती के आगे पीछे घूमता रहता है।
-----------झबरीली इन्जीनियेर शर्मा साहब की कोठी में रहने वाली बड़े बड़े बालों वाली सफ़ेद अच्छी नस्ल की कुतिया थी। इठला कर गुर्राई,'भूं .s.s.भौं s sऔं भूट, तो इससे क्या , कालू कहीं का । चल हट, मेरा बेटा कोठी में पला-बढ़ा , साहबों की सोहबत में है, तू फटेहाल झौंपडी में रहने वाला कुत्ता! तेरी क्या मजाल । बड़ा आया। तेरे पास क्या है देने को? क्या दहेज़ देगा? कल ही नीलू कुतिया अपनी मिंकी बेटी का रिश्ता लाई थी। शगुन पर ही चांदी का पट्टा देने की बात कर रही थी।
\
           भौं s s अंग.. भट, दो हड्डियां है मेरे पास, दावत के लिए, झोंपड़ी के पीछे दबा कर रखी हैं । पर ये दहेज़ क्या होता है? कालू असमंजस में पड़कर बोला।
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           भूं .s.s..s भू...अक:॥, अरे तभी तो। तुम गली के छोटे लोग हो, बड़े घरों की बातें कहाँ जानते हो। चल हट, बड़ा आया।
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          बातें सुनकर इधर-उधर के कुछ कुत्ते भी एकत्र होगये थे ।
--------अरे, ये आदमियों के चोंचले हैं । पड़ोस के सिल्की कुत्ते ने भों भों करके बताया। आदमी लोग बेटों की शादी में खूब माल काटते हैं। सोना, चांदी,कार, नकद रुपया-पैसा के साथ ही बेटे की शादी करते हैं। जो भी अधिक से अधिक दे सके..... ।-
---------हाँ हाँ , 'उस दिन जब में कोठी न. सोलह के साहब के यहाँ दावत में फैंकी हुई मिठाई, पूड़ी, सब्जी के मज़े लेरहा था तो मैंने भी सुना कि साहब को खूब माल व इम्पोर्टेड कार मिली है। कोई पच्चीस लाख की शादी थी । ' ब्राउनी कुत्ता बोला।
---------' पर जो देते हैं वे इतना सारा माल लाते कहाँ से होंगे। ' कालू ने पूछा।
            'कुछ नं. दो का चक्कर है। मैंने कुछ लोगों को यह भी कहते सुना था।' ब्राउनी बोला।
;-------यार ! ये आदमी भी अजीब , वेवकूफ जानवर है, मिठाई, पूड़ी आदि खाना, आखिर ये लोग फैंकते ही क्यों हैं? क्या मिलता इन्हें इसमें । '
'चलो हमारे लिए तो मज़े ही रहते हैं। '
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             ' हाँ सो तो है। पर हमारे साथ कुछ दुबले-पतले किस्म के इंसान भी तो टूट पड़ रहे थे उस खाने पर। क्या उन लोगों के पास इतना खाना नहीं होता।' ब्राउनी बोला।
\
            'पता नहीं, ये इंसान भी विचित्र प्राणी है। कोई खूब खाना फैंकता है, कोई फैंके हुए को उठाता है। इसमें भी उसका कुछ मतलब ही होगा। क्योंकि मैंने सुना है कि आदमी बड़ा चतुर जानवर होता है, कोई काम बिना मतलब के नहीं करता।' सिल्की ने बताया।
--------' हो सकता है कोठी वाले आदमी लोग भी किसी के पालतू होते होंगे, जैसे झबरीली कुतिया और ये दुबले-पतले इंसान हमारी तरह गली झौंपडी वाले जानवर।' पप्पी पिल्ले ने अपना दिमाग लड़ाया ।
---------'हो..हो..हो॥, सब हंसते हुए भोंके, ये आदमी की लाइफ भी हम कुत्तों जैसी ही है। ' पर इनके गले में पट्टा तो नहीं दिखाई देता। ' ब्राउनी हंसते हुए बोला। 'शायद इनको पालने वाला जानवर इनसे भी अधिक चतुर होता होगा। '
         'भुक..भुक...भुक .s.s.और हम कुत्ते दहेज़ भी तो नहीं माँगते,बेटियों को नहीं जलाते। इसमें तो आदमियों से अच्छे ही हैं। अब सोलह न. वाले साहब को शादी में इतना मिला फिर भी साल भर बाद ही बहू को जलाने की कोशिश में जेल में हैं। ' ब्राउनी ने बताया।
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            ' वो तो भला हो भूरा का,' लंगडाकर धीरे धीरे आता हुआ चितकबरा कुत्ता बोला,'जो रात में भौंक भौंक कर सारा मोहल्ला जगा दिया, और बहू-बिटिया बच गयी।
-------- पड़ोस की पढी-लिखी सुमन दीदी, जो समाज-सेवा का काम करती है ; और वो जाने क्या होता है, नारी जागरण, के भाषण देती रहती है; अचानक जाग गयी और कुत्ता क्यों जाने लगातार भोंक रहा है, यह देखने दौड़ी चली आई। वरना ये लोग तो महीनों से हरकत कर रहे थे कोई आदमी बीच में पड़ने नहीं आया। '
---------' कृष्णा ..कृष्णा..एसा नीच कुकर्म, कमीना कुत्ता कहीं का। '
           ' भों.s..s.भौं .sss.. क्यों कुत्तों को गाली दे रहा है।' सिल्की गुर्राया।
--------'भूं.n.n..भूं..n.अक..सारी' , कालू सकपका कर बोला, 'मेरा मतलब था आदमी कहीं का। '
\
             'अजीव है ये आदमी भी' , कालू सोचते हुए बोला, 'अपने भाई बंधुओं से ही दुश्मनी निकलता है,अपनी ही बहू-बेटियों को बिकने, जलने, मरने देता है। और कहावत बना रखी है,'क्यों कुत्तों की तरह लड़ते हो'; 'क्या इनका राजा या मुखिया नहीं होता,वो कुछ नहीं कहता?'
\
                राजा..s..s..s.चितकबरा सोचते हुए बोला,' आदमी लोग स्वयं अपने राजा होते हैं,आज कल इनके यहाँ वो न जाने क्या है...मन्त्र या तंत्र व्यवस्था ; बड़ी अजीब सी चीज है। ये लोग स्वयं को वोट जैसी कुछ चीज देते हैं और खुद ही राजा बन जाते हैं। ----
---------कोई भी राजा बन जाता है। न कोई पराक्रम ,न विद्वता मंडली की या गुरु मंडली की कोई सलाह ली जाती है। न राजा का बेटा ही राजा होता है। भीड़ जिस तरफ होती है वही राजा बन जाता है। और कई बार तो साल में चार चार बार राजा बदल जाता है। कौन किसे मना करे, कौन किसे दंड दे। '
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        ' ये तो अंधेर नगरी वाली बात हुई। पर हम क्यों उनकी हरकतों को अपना रहे हैं?' सिल्की बोला।
\
              ' अरे भाई! एक मछली सारे तालाब को गंदा करती है। अपनी जाति या समाज के पतन के लिए स्वयं हमारे काम ही तो जिम्मेदार होते हैं। ' अब देखलो साहबों के यहाँ रहने के कारण ही वो झबरीली को घमंड व दहेज़ जैसी बीमारी लग गयी है। मनुष्य तो कुत्तों को अपने स्वार्थ के लिए पालता है,गुलामी कराने को और उनकी गंदी आदतें कुत्तों में आ जाती हैं। अगर इसे शीघ्र ही नहीं रोका गया तो देखा-देखी अन्य कुत्तों में भी यह बीमारी फ़ैल सकती है। ' भूरा बोला,' आदमी शायद सभी जानवरों से बुरा है। '
\
                 ' झबरीली तो बुरी तरह से बिगड़ गयी है। बस आदमियों के पीछे पीछे घूमती रहती है। उन्हीं की तरह बात करने की कोशिश करती है। अपने को आदमी ही समझने लगी है। बिस्कुट का नाश्ता,दूध-रोटी का लंच-डिनर, आदमी के खाने की अच्छी अच्छी चीज़ों के स्वाद में लालच ने इसे पागल कर दिया है। साहब ने कोट भी बनवा दिया है,साहब बनी घूमती है और गुलामी का पट्टा व ज़ंजीर गले में बांधे अपनी शान समझती है।
-------अच्छा खाना, पहनना, सोने के लालच में अपना कुत्तापन भी भूल गयी है। और बिगडैल आदमी की तरह बनती जारही है कुत्तों से तो बात ही नहीं करती, नकचढी कहीं की। ' ब्राउनी कुत्ता बोला।
---------' राम...राम ..एसा दुष्कृत्य और नीचता की बात कर रही है ये झबरीली। कमीनी आदमी कहीं की। ' कालू कुत्ता जोर से गुर्राया। ' इससे अच्छे तो हम कुत्ते ही हैं,आदमी तो कुत्तों से भी गया बीता है। कान पकडे जो अब झबरीली की तरफ पूंछ भी करूँ तो। कराले अपने बेटे की शादी आदमियों में ही। '\
' अरे जब कोई इसकी और मुंह उठाके देखेगा ही नहीं तो अपने आप झख मारकर कुत्तों की और दौड़ेगी।
--------आदमी तो इसके काम आयेगा नहीं,जब वह अपने आदमियों का ही नहीं होता , अपने लोगों को ही सताता है,उन्हें जलने मरने देता है तो कुत्तों का क्या होगा।
-------अगर सभी कुत्ते एकजुट होजाएं और इसका बायकाट करदें अपने आप ही सातवें आसमान पर चढ़ा दिमाग उतर जायगा। ' मरियल सा झबरीला कुत्ता बोला, ' मैंने इसे बहुत समझाया था पर इसने मुझे ही दौड़ाकर कोठी से बाहर निकलवा दिया। '
\
अच्छा भाई कुत्तो! जय सारमेय , कालू बोला,' आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद, जो मुझे पाप में पड़ने से बचा लिया।
---------आप सब यहाँ बायकाट कराकर कुत्ता समाज सुधार संघर्ष में रत रहें , मैं अन्य कालोनियों में भी इसका बायकाट कराऊंगा। तभी एसे कुत्ते लोग ठीक होंगे। '

बुधवार, 2 अगस्त 2017

गरीबी, भूखे को रोटी-दूध .....मंदिर, भगवान, आस्था...डा श्याम गुप्त ....



               प्रेमचंद आदि गरीबों के मसीहा एवं आजकल कवियों, लेखकों, व्यंगकारों , समाज के ठेकेदारों, नेताओं, मीडिया का प्रिय विषय है...गरीबी, भूखे को रोटी-दूध .....मंदिरों, भगवान, मूर्तियों आदि आस्थाओं को तोड़कर उंनके स्थान पर ---गरीबों, भूखों को देना चाहिए ..आदि आदि --

-----उनके लिए कुछ छंद प्रस्तुत हैं----
\\
मेरे कारण नहीं है कोई, इस जगत में भूखा प्यासा,
यदि इक दिन मैं रोटी देदूं , क्या पूरी हो सब अभिलाषा |

पोथी लिखी व गाल बजाये, युगों गरीब गरीब चिल्लाए,
जो जैसा अब भी वैसा ही, क्यों न प्रभु से नेह लगाये |

जिसका जैसा भाग्य-कर्म है, उसको वैसा देता राम,
हम-तुम दें, या लिखें प्रेमचंद, आये नहीं किसी के काम |

पाथर पूजें, दूध चढे तो, रहे आस्था मन में जान,
बिना आस्था, कैसे कहिये, दे गरीब को कोई दान |

धर्म आस्था को नहीं तोडिये, यह है ईश्वर का सम्मान,
नारायण सम्मान नहीं यदि, कैसे हो नर का, श्रीमान |

मुंशी प्रेमचंद्र का आलेख-----साम्प्रदायिकता व संस्कृति---डा श्याम गुप्त ..

मुंशी प्रेमचंद्र का आलेख-----साम्प्रदायिकता व संस्कृति--चित्र में देखें ---- यह आलेख मुंशी जी ने १९३४ में लिखा था |
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-------मुंशी जी ने यहाँ संस्कृति , साम्प्रदायिकता --के बारे में लिखते हुए हिन्दू व मुस्लिम दोनों को एक ही पलड़े पर रखा था, दोनों के रहन सहन, व्यवहार, खान-पान एक ही से थे,वे कहते हैं कि ---तो लोग किस संस्कृति के रक्षण की बात करते हैं, संस्कृति रक्षण की बात लोगों को साम्प्रदायिकता की और लेजाने का पाखण्ड है |
--------वे कहते हैं कि संसार में हिन्दू ही एक जाति-- है जो गाय को अखाद्य व अपवित्र समझती है---- तो क्या इसके लिए हिन्दुओं कोसमस्त विश्व से धर्म संग्राम छेड़ देना चाहिए |
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एसा प्रतीत होता है कि वास्तव में मुंशीजी को विश्व की स्थितियों एवं इस्लाम धर्म व उसके अनुयाइयों की मूल व्यवहारिक व धार्मिक कट्टरता के बारे में अनुमान नहीं था, जो गलती गांधीजी ने की वही सभी गांधीवादी विचारों ने भी की, अन्यथा वे ऐसा न कहते ---यदि आज वे होते तो अपने कथन पर दुःख: प्रकट कर रहे होते ..उनकी कहानियों के रूप भी कुछ भिन्न होते ..आज यूरोप व एशिया के कुछ देशीं में गाय -वध दंडनीय अपराध है |

----जो उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम दोनों के समान संस्कृति, पहनावा, खान-पान की बात लिखी थी वह ब्रिटिश राज में दोनों के दास स्थिति में होने के कारण थी एवं अधिकाँश वे मुस्लिम हिन्दुओं से ही मुस्लिम बनाए हुए थे अतः अपना पहनावा आदि एक ही थे ...
-----स्वतन्त्रता मिलते ही स्थिति एक दम बदल गयी, पाकिस्तान के रूप में एवं मुस्लिमों का सहज आक्रामक रूप सामने आगया जो देश के विभाजन एवं उसके समय की वीभत्स घटनाओं से ज्ञात होता है एवं आज विश्व भर में फैले हुए आतंकवाद से |
---- तमाम बातें असत्य भी लिखी गयी है --यथा--हिन्दुओं द्वारा गाय को अपवित्र समझना --बिंदु ४..,,मद्रासी हिन्दू का संस्कृत न समझना --बिंदु -१..
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संस्कृति ही मानव का व्यवहार तय करती है और वह--सुसंस्कृति या अपसंस्कृति होती है | सुसंस्कृति का रक्षण होना ही चाहिए |

सोमवार, 31 जुलाई 2017

सृष्टि के आदिपुरुष - शिव ---डा श्याम गुप्त








                           सृष्टि के आदिपुरुष - शिव
                                           
आदि-पुरुष शिवसृष्टि, व्याप्ति व विनाश  के देवता शिव, विश्व के सभी ज्ञान, धर्म, दर्शन, समाज, विज्ञान के मूल अधिष्ठाता हैं| शिव जी से प्रत्येक कण की उत्पत्ति हुई है तथा उन्ही मे प्रत्येक कण की समाप्ति होती है इन्हें महादेव, भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ के नाम से भी जाना जाता है | शिव के दर्शन और जीवन की कहानी दुनिया के हर धर्म और उनके ग्रंथों में अलग-अलग रूपों में विद्यमान है। भगवान शिव हिन्दू संस्कृति के प्रणेता आदिदेव महादेव हैं। शिव शब्द का अर्थ है 'कल्याण'  | शिव ही विश्व के सर्वप्रथम समन्वयक थे , मानव कल्याण हेतु उन्होंने ही विष्णु व ब्रह्मा के साथ मिलकर देव, असुर व मानव का समन्वय करा कर एक नवीन दृष्टि वाले विश्व-संस्कृति  का निर्माण किया |
     आइंस्टीन से युगों पूर्व आदियुग में ही शिव ने ही कहा था कि कल्पनाज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है। हम जैसी कल्पना और विचार करते हैं  वैसे ही हो जाते हैं। शिव ने इस आधार पर ध्यान की कई विधियों का विकास किया। अतः वे योग धर्म व दर्शन शास्त्र के मूल प्रवर्तक हुए | उन्होंने ही वेदों की रचना की |
    योगशास्त्र के प्रवर्तक भगवान शिव के विज्ञान भैरव तंत्रऔरशिव संहिता में उनकी संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है। भगवान शिव के योग को तंत्र या वामयोग कहते हैं। इसी की एक शाखा हठयोग की है। भगवान शिव कहते हैं- वामो मार्ग: परमगहनो योगितामप्यगम्य:-मेरुतंत्र --अर्थात वाम मार्ग अत्यंत गहन है और योगियों के लिए भी अगम्य है।
 
    चित्र—योगीराज पशुपति शिव --- हरप्पा सील—पूर्व-हरप्पा सभ्यता
        भगवान शिव ही पहले योगी हैं और मानव स्वभाव की सबसे गहरी समझ उन्हीं को है। उन्होंने अपने ज्ञान के विस्तार के लिए 7 ऋषियों (सप्तर्षियों ) को चुना और उनको योग के अलग-अलग पहलुओं का ज्ञान दिया, जो योग के 7 बुनियादी पहलू बन गए। वक्त के साथ इन 7 रूपों से सैकड़ों शाखाएं हुईं | बाद में योग में आई जटिलता को देखकर पतंजलि ने 300 ईसा पूर्व मात्र 200 सूत्रों में पूरे योग शास्त्र को समेट दिया। योग का 8वां अंग मोक्ष है। 7 अंग तो उस मोक्ष तक पहुंचने के लिए है। 
        अमरनाथ के अमृत वचन : शिव ने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया, उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। विज्ञान भैरव तंत्र एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए ध्यान सूत्रों का संकलन है।
    आज से 15 से 20 हजार वर्ष पूर्व वराह काल की शुरुआत में जब देवी-देवताओं ने धरती पर कदम रखे,  तब उस काल में धरती हिमयुग की चपेट में थी। इस दौरान भगवान शिवशंकर ने धरती के केंद्र- कैलाश को अपना निवास स्थान बनाया | यही क्षेत्र में आज का चीन का क्षेत्र है|
    विष्णु ने समुद्र (क्षीर सागर) को और ब्रह्मा ने नदी(सरस्वती) के किनारे (सुमेरु पर्वत) को अपना स्थान बनाया था। पुराण कहते हैं कि जहां पर शिव विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे भगवान विष्णु का स्थान है। शिव के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार क्रमश: स्वर्गलोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है, जबकि धरती पर कुछ भी नहीं था। इन तीनों से सब कुछ हो गया।
 चीनी
चित्र-चीनी ड्रेगन व बौने सेवक, चीनी-मानव के साथ शिव-पार्वती---बादामी गुफाएं –कर्नाटक, भारत
            वैज्ञानिकों के अनुसार तिब्बत धरती की सबसे प्राचीन भूमि है और पुरातनकाल में इसके चारों ओर समुद्र हुआ करता था। फिर जब समुद्र हटा तो अन्य धरती का प्रकटन हुआ और इस तरह धीरे-धीरे जीवन भी फैलता गया।
          सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें आदिदेव भी कहा जाता है। शिव कोआदिनाथभी कहा जाता है। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम आदिश भी है। इसआदिशशब्द से ही आदेशशब्द बना है। नाथ साधु जब एकदूसरे से मिलते हैं तो कहते हैं- आदेश।
      शिव के अलावा ब्रह्मा और विष्णु ने संपूर्ण धरती पर जीवन की उत्पत्ति और पालन का कार्य किया। सभी ने मिलकर धरती को रहने लायक बनाया और यहां देवता, दैत्य, दानव, गंधर्व, यक्ष और मनुष्य की आबादी को बढ़ाया।
         ऐसी मान्यता है कि महाभारत काल तक देवता धरती पर रहते थे। महाभारत के बाद सभी अपने-अपने धाम चले गए। कलयुग के प्रारंभ होने के बाद देवता बस विग्रह रूप में ही रह गए अत: उनके विग्रहों की पूजा की जाती है।
पहले शिव थे रुद्र : वैदिक काल के रुद्र और उनके अन्य स्वरूप तथा जीवन दर्शन को पुराणों में विस्तार मिला। वेद जिन्हें रुद्र कहते हैं, पुराण उन्हें शंकर और महेश कहते हैं।
देवों के देव महादेव : देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे। दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर शिव के समक्ष झुक गए इसीलिए शिव हैं देवों के देव महादेव। वे दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं।
ब्रह्मा ने बनाए विशालकाय मानव : सन् 2007 में नेशनल जिओग्राफी की टीम ने भारत और अन्य जगह पर 20 से 22 फिट मानव के कंकाल ढूंढ निकाले हैं। भारत में मिले कंकाल को कुछ लोग भीम पुत्र घटोत्कच और कुछ लोग बकासुर का कंकाल मानते हैं।
         हिन्दू धर्म के अनुसार सतयुग में इस तरह के विशालकाय मानव हुआ करते थे। बाद में त्रेतायुग में इनकी प्रजाति नष्ट हो गई। पुराणों के अनुसार भारत में दैत्य, दानव, राक्षस और असुरों की जाति का अस्तित्व था, जो इतनी ही विशालकाय हुआ करती थी।
         भारत में मिले इस कंकाल के साथ एक शिलालेख भी मिला है। यह उस काल की ब्राह्मी लिपि का शिलालेख है कि ब्रह्मा ने मनुष्यों में शांति स्थापित करने के लिए विशेष आकार के मनुष्यों की रचना की थी। विशेष आकार के मनुष्यों की रचना एक ही बार हुई थी। ये लोग काफी शक्तिशाली होते थे और पेड़ तक को अपनी भुजाओं से उखाड़ सकते थे। लेकिन इन लोगों ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया और आपस में लड़ने के बाद देवताओं को ही चुनौती देने लगे। अंत में भगवान शंकर ने सभी को मार डाला और उसके बाद ऐसे लोगों की रचना फिर नहीं की गई।
शिव का धनुष पिनाक : शिव ने जिस धनुष को बनाया था उसकी टंकार से ही बादल फट जाते थे और पर्वत हिलने लगते थे। ऐसा लगता था मानो भूकंप आ गया हो। यह धनुष बहुत ही शक्तिशाली था। इसी के एक तीर से त्रिपुरासुर की तीनों नगरियों को ध्वस्त कर दिया गया था। इस धनुष का नाम पिनाक था। देवी और देवताओं के काल की समाप्ति के बाद इस धनुष को देवरात को सौंप दिया गया था।
        राजा दक्ष के यज्ञ में यज्ञ का भाग शिव को नहीं देने के कारण भगवान शंकर बहुत क्रोधित हो गए थे और उन्होंने सभी देवताओं को अपने पिनाक धनुष से नष्ट करने की ठानी। एक टंकार से धरती का वातावरण भयानक हो गया। बड़ी मुश्किल से उनका क्रोध शांत किया गया, तब उन्होंने यह धनुष देवताओं को दे दिया।
       देवताओं ने राजा जनक के पूर्वज देवरात को दे दिया। शिव-धनुष उन्हीं की धरोहरस्वरूप राजा जनक के पास सुरक्षित था। इस धनुष को भगवान शंकर ने स्वयं अपने हाथों से बनाया था। उनके इस विशालकाय धनुष को कोई भी उठाने की क्षमता नहीं रखता था। लेकिन भगवान राम ने इसे उठाकर इसकी प्रत्यंचा चढ़ाई और इसे एक झटके में तोड़ दिया।
शिव का चक्र : चक्र को छोटा, लेकिन सबसे अचूक अस्त्र माना जाता था। सभी देवी-देवताओं के पास अपने-अपने अलग-अलग चक्र होते थे। उन सभी के अलग-अलग नाम थे। शंकरजी के चक्र का नाम भवरेंदु,  विष्णुजी के चक्र का नाम कांता चक्र और देवी का चक्र मृत्यु मंजरी के नाम से जाना जाता था। सुदर्शन चक्र का नाम भगवान कृष्ण के नाम के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
      सुदर्शन चक्र का निर्माण भगवान शंकर ने किया था। निर्माण के बाद भगवान शिव ने इसे श्रीविष्णु को सौंप दिया था। जरूरत पड़ने पर श्रीविष्णु ने इसे देवी पार्वती को प्रदान कर दिया। पार्वती ने इसे परशुराम को दे दिया और भगवान कृष्ण को यह सुदर्शन चक्र परशुराम से मिला।
त्रिशूल : इस तरह भगवान शिव के पास कई अस्त्र-शस्त्र थे लेकिन उन्होंने अपने सभी अस्त्र-शस्त्र देवताओं को सौंप दिए। उनके पास सिर्फ एक त्रिशूल ही होता था। यह बहुत ही अचूक और घातक अस्त्र था। त्रिशूल 3 प्रकार के कष्टों दैनिक, दैविक, भौतिक के विनाश का सूचक है। इसमें 3 तरह की शक्तियां हैं- सत, रज और तम। प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन। इसके अलावा पाशुपतास्त्र भी शिव का अस्त्र है।
शिव का सेवक वासुकी : शिव को नागवंशियों से घनिष्ठ लगाव था। नागकुल के सभी लोग शिव के क्षेत्र हिमालय में ही रहते थेकश्मीर का अनंतनाग इन नागवंशियों का गढ़ था। नागकुल के सभी लोग शैव धर्म का पालन करते थे। नागों के प्रारंभ में 5 कुल थे। उनके नाम इस प्रकार हैं- शेषनाग (अनंत), वासुकी, तक्षक, पिंगला और कर्कोटक। यह सुनिश्चित नहीं है कि ये लोग सर्प थे या मानव या आधे सर्प और आधे मानव हालांकि इन सभी को देवताओं की श्रेणी में रखा गया है तो निश्‍चित ही ये मनुष्य नहीं होंगे। नाग वंशावलियों में शेषनागको नागों का प्रथम राजा माना जाता है। शेषनाग को ही अनंतनाम से भी जाना जाता है। ये भगवान विष्णु के सेवक थे। इसी तरह आगे चलकर शेष के बाद वासुकी हुए, जो शिव के सेवक बने। फिर तक्षक और पिंगला ने राज्य संभाला। वासुकी का कैलाश पर्वत के पास ही राज्य था और मान्यता है कि तक्षक ने ही तक्षकशिला (तक्षशिला) बसाकर अपने नाम सेतक्षककुल चलाया था।
       उनके बाद ही कर्कोटक, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अनत, अहि, मनिभद्र, अलापत्र, कम्बल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना इत्यादि नाम से नागों के वंश हुए जिनके भारत के भिन्न-भिन्न इलाकों में इनका राज्य था।
 शिव के शिष्य : शिव तो जगत के गुरु हैं। मान्यता अनुसार सबसे पहले उन्होंने अपना ज्ञान सप्त ऋषियों को दिया था। सप्त ऋषियों ने शिव से ज्ञान लेकर अलग-अलग दिशाओं में फैलाया और दुनिया के कोने-कोने में शैव धर्म, योग और ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया। इन सातों ऋषियों ने ऐसा कोई व्यक्ति नहीं छोड़ा जिसको शिव कर्म, परंपरा आदि का ज्ञान नहीं सिखाया गया हो। आज सभी धर्मों में इसकी झलक देखने को मिल जाएगी। परशुराम और रावण भी शिव के शिष्य थे।
शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत ‍की थी जिसके चलते आज भी नाथ, शैव, शाक्त आदि सभी संतों में उसी परंपरा का निर्वाह होता आ रहा है। आदि गुरु शंकराचार्य और गुरु गोरखनाथ ने इसी परंपरा और आगे बढ़ाया।
शिव गण : भगवान शिव की सुरक्षा और उनके आदेश को मानने के लिए उनके गण सदैव तत्पर रहते हैं। उनके गणों में भैरव को सबसे प्रमुख माना जाता है। उसके बाद नंदी का नंबर आता और फिर वीरभ्रद्र। जहां भी शिव मंदिर स्थापित होता है, वहां रक्षक (कोतवाल) के रूप में भैरवजी की प्रतिमा भी स्थापित की जाती है। दूसरी ओर वीरभद्र शिव का एक बहादुर गण था जिसने शिव के आदेश पर दक्ष प्रजापति का सर धड़ से अलग कर दिया। देव संहिता और स्कंद पुराण के अनुसार शिव ने अपनी जटा से वीरभद्रनामक गण उत्पन्न किया।
        इस तरह उनके ये प्रमुख गण थे- भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है। ये सभी गण धरती और ब्रह्मांड में विचरण करते रहते हैं और प्रत्येक मनुष्य, आत्मा आदि की खैर-खबर रखते हैं।
शिव के द्वारपाल : कैलाश पर्वत के क्षेत्र में उस काल में कोई भी देवी या देवता, दैत्य या दानव शिव के द्वारपाल की आज्ञा के बगैर अंदर नहीं जा सकता था। ये द्वारपाल संपूर्ण दिशाओं में तैनात थे। इन द्वारपालों के नाम हैं- नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल।
कामशास्त्र की रचना ----शिव के गण और द्वारपाल नंदी ने ही कामशास्त्र की रचना की थी। कामशास्त्र के आधार पर ही कामसूत्र लिखा गया था।
शिव पंचायत : पंचायत का फैसला अंतिम माना जाता है। देवताओं और दैत्यों के झगड़े आदि के बीच जब कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेना होता था तो शिव की पंचायत का फैसला अंतिम होता था। शिव की पंचायत में 5 देवता शामिल थे।
ये 5 देवता थे:- 1. सूर्य, 2. गणपति, 3. देवी, 4. रुद्र और 5. विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं।
शिव पार्षद : जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं ‍उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि ‍शिव के पार्षद हैं। यहां देखा गया है कि नंदी और भृंगी गण भी है, द्वारपाल भी है और पार्षद भी।
शिव चिह्न : वनवासी से लेकर सभी साधारण व्‍यक्ति जिस चिह्न की पूजा कर सकें, उस पत्‍थर के ढेले, बटिया को शिव का चिह्न माना जाता है। इसके अलावा रुद्राक्ष और त्रिशूल को भी शिव का चिह्न माना गया है। कुछ लोग डमरू और अर्ध चंद्र को भी शिव का चिह्न मानते हैं। हालांकि ज्यादातर लोग शिवलिंग अर्थात शिव की ज्योति का पूजन करते हैं।
चित्र-  शिवलिंग एवं रुद्राक्ष
 शिव से जुड़ी अन्य  बातें---
 शिव की गुफा व भस्मासुर: शिव ने एक असुर को वरदान दिया था कि तू जिसके भी सिर पर हाथ रखेगा वह भस्म हो जाएगा। इस वरदान के कारण ही उस असुर का नाम भस्मासुर हो गया। उसने सबसे पहले शिव को ही भस्म करने की सोची।
       भस्मासुर से बचने के लिए भगवान शंकर वहां से भागे, उनके पीछे भस्मासुर भी भागने लगा। भागते-भागते शिवजी एक पहाड़ी के पास रुके और फिर उन्होंने इस पहाड़ी में अपने त्रिशूल से एक गुफा बनाई और वे फिर उसी गुफा में छिप गए। बाद में विष्णुजी ने आकर उनकी जान बचाई।
      माना जाता है कि वह गुफा जम्मू से 150 किलोमीटर दूर त्रिकूटा की पहाड़ियों पर है। इन खूबसूरत पहाड़ियों को देखने से ही मन शांत हो जाता है। इस गुफा में हर दिन सैकड़ों की तादाद में शिवभक्त शिव की अराधना करते हैं।
राम - शिव का  युद्ध : सभी जानते हैं कि राम के आराध्यदेव शिव हैं, तब फिर राम कैसे शिव से युद्ध कर सकते हैं? पुराणों में विदित दृष्टांत के अनुसार यह युद्ध श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ के दौरान लड़ा गया।
       यज्ञ का अश्व कई राज्यों को श्रीराम की सत्ता के अधीन किए जा रहा था। इसी बीच यज्ञ का अश्व देवपुर पहुंचा, जहां राजा वीरमणि का राज्य था। वीरमणि ने भगवान शंकर की तपस्या कर उनसे उनकी और उनके पूरे राज्य की रक्षा का वरदान मांगा था। महादेव के द्वारा रक्षित होने के कारण कोई भी उनके राज्य पर आक्रमण करने का साहस नहीं करता था। जब यज्ञ का घोड़ा उनके राज्य में पहुंचा तो राजा वीरमणि के पुत्र रुक्मांगद ने उसे बंदी बना लिया। ऐसे में अयोध्या और देवपुर में युद्ध होना तय था।
       महादेव ने अपने भक्त को मुसीबत में जानकर वीरभद्र के नेतृत्व में नंदी, भृंगी सहित अपने सारे गणों को भेज दिया। एक और राम की सेना तो दूसरी ओर शिव की सेना थी। वीरभद्र ने एक त्रिशूल से राम की सेना के पुष्कल का मस्तक काट दिया। उधर भृंगी आदि गणों ने भी राम के भाई शत्रुघ्न को बंदी बना लिया।   
       बाद में हनुमान भी जब नंदी के शिवास्त्र से पराभूत होने लगे तब सभी ने राम को याद किया। अपने भक्तों की पुकार सुनकर श्रीराम तत्काल ही लक्ष्मण और भरत के साथ वहां आ गए। श्रीराम ने सबसे पहले शत्रुघ्न को मुक्त कराया और उधर लक्ष्मण ने हनुमान को मुक्त करा दिया। फिर श्रीराम ने सारी सेना के साथ शिव गणों पर धावा बोल दिया।
     जब नंदी और अन्य शिव के गण परास्त होने लगे तब महादेव ने देखा कि उनकी सेना बड़े कष्ट में है तो वे स्वयं युद्ध क्षेत्र में प्रकट हुए, तब श्रीराम और शिव में युद्ध छिड़ गया।
     भयंकर युद्ध के बाद अंत में श्रीराम ने पाशुपतास्त्र निकालकर कर शिव से कहा, ‘हे प्रभु, आपने ही मुझे ये वरदान दिया है कि आपके द्वारा प्रदत्त इस अस्त्र से त्रिलोक में कोई पराजित हुए बिना नहीं रह सकता इसलिए हे महादेव, आपकी ही आज्ञा और इच्छा से मैं इसका प्रयोग आप पर ही करता हूं’, ये कहते हुए श्रीराम ने वो महान दिव्यास्त्र भगवान शिव पर चला दिया।
         वो अस्त्र सीधा महादेव के ह्वदयस्थल में समा गया और भगवान रुद्र इससे संतुष्ट हो गए। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक श्रीराम से कहा कि आपने युद्ध में मुझे संतुष्ट किया है इसलिए जो इच्छा हो वर मांग लें। इस पर श्रीराम ने कहा कि हे भगवन्, यहां मेरे भाई भरत के पुत्र पुष्कल सहित असंख्य योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गए है, कृपया कर उन्हें जीवनदान दीजिए।महादेव ने कहा कि तथास्तु।इसके बाद शिव की आज्ञा से राजा वीरमणि ने यज्ञ का अश्व श्रीराम को लौटा दिया और श्रीराम भी वीरमणि को उनका राज्य सौंपकर शत्रुघ्न के साथ अयोध्या की ओर चल दिए।
 ब्रह्मा, विष्णु और शिव का जन्म रहस्य ---तीनों के जन्म की कथाएं वेद और पुराणों में अलग-अलग हैं, यहां यह बात ध्यान रखने की है कि ईश्वर अजन्मा है।
       अलग-अलग पुराणों में भगवान शिव और विष्णु के जन्म के विषय में कई कथाएं प्रचलित हैं। शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव को स्वयंभू माना गया है जबकि विष्णु पुराण के अनुसार भगवान विष्णु स्वयंभू हैं।
      शिव पुराण के अनुसार एक बार जब भगवान शिव अपने टखने पर अमृत मल रहे थे तब उससे भगवान विष्णु पैदा हुए जबकि विष्णु पुराण के अनुसार ब्रह्मा भगवान विष्णु की नाभि कमल से पैदा हुए जबकि शिव भगवान विष्णु के माथे के तेज से उत्पन्न हुए बताए गए हैं। विष्णु पुराण के अनुसार माथे के तेज से उत्पन्न होने के कारण ही शिव हमेशा योगमुद्रा में रहते हैं।
शिव के जन्म की कहानी हर कोई जानना चाहता है। श्रीमद्भागवत के अनुसार एक बार जब भगवान विष्णु और ब्रह्मा अहंकार से अभिभूत हो स्वयं को श्रेष्ठ बताते हुए लड़ रहे थे, तब एक जलते हुए खंभे (मूल ज्योतिर्लिंग ) से जिसका कोई भी ओर-छोर ब्रह्मा या विष्णु नहीं समझ पाए, भगवान शिव प्रकट हुए।
        यदि किसी का बचपन है तो निश्चत ही जन्म भी होगा और अंत भी। विष्णु पुराण में शिव के बाल रूप का वर्णन मिलता है। इसके अनुसार ब्रह्मा को एक बच्चे की जरूरत थी। उन्होंने इसके लिए तपस्या की। तब अचानक उनकी गोद में रोते हुए बालक शिव प्रकट हुए। ब्रह्मा ने बच्चे से रोने का कारण पूछा तो उसने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया कि उसका नाम
ब्रह्मानहीं है इसलिए वह रो रहा है।
            तब ब्रह्मा ने शिव का नाम रुद्ररखा जिसका अर्थ होता है रोने वाला शिव तब भी चुप नहीं हुए इसलिए ब्रह्मा ने उन्हें दूसरा नाम दिया, पर शिव को नाम पसंद नहीं आया और वे
 चित्र-वाल रूप शिव ,,,
फिर भी चुप नहीं हुए। इस तरह शिव को चुप कराने के लिए ब्रह्मा ने 8 नाम दिए और शिव 8 नामों (रुद्र, शर्व, भाव, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान और महादेव) से जाने गए। शिव पुराण के अनुसार ये नाम पृथ्वी पर लिखे गए थे
भगवान शिव की थीं चार पत्नियां----हिन्दू पुराणों में भगवान शिव के ‍जीवन का जो चित्रण मिलता है वह बहुत ही विरोधाभासिक और न समझ में आने वाला लगता है|
. दक्ष पुत्री सती ---माता सती के ही हैं सारे शक्तिपीठ --भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक प्रजापति दक्ष कश्मीर घाटी के हिमालय क्षेत्र में रहते थे। प्रजापति दक्ष की दो पत्नियां थी- प्रसूति और वीरणी। प्रसूति से दक्ष की चौबीस कन्याएं जन्मी और वीरणी से साठ कन्याएं। इस तरह दक्ष की 84 पुत्रियां और हजारों पुत्र थे। दक्ष की सभी पुत्रियों को किस न किसी... भारत में पूजा जाता है और सभी को माता दुर्गा से जोड़ कर देखा जाता है।  राजा दक्ष की पुत्री 'सती' की माता का नाम था प्रसूति। यह प्रसूति स्वायंभुव मनु की तीसरी पुत्री थी। सती ने अपने पिता की इच्छा के विरूद्ध कैलाश निवासी शंकर से प्रेम विवाह किया था, जो सृष्टि का प्रथम प्रेम विवाह था |
                               
चित्र- दक्ष-यज्ञ में भष्म सती का शव उठाये हुए शिव...      चित्र- शिव परिवार-पार्वती, कार्तिकेय व गणेश
       सती के आत्मदाह के उपरांत विश्व शक्तिहीन हो गया। उस भयावह स्थिति से त्रस्त महात्माओं ने आदिशक्ति देवी की आराधना की। तारक नामक दैत्य सबको परास्त कर त्रैलोक्य पर एकाधिकार जमा चुका था।
२. गणेश और कार्तिकेय की माता पार्वती : दक्ष के बाद सती ने हिमालय के राजा हिमवान और रानी मैनावती के यहां जन्म लिया। मैनावती और हिमवान को कोई कन्या नहीं थी तो उन्होंने... तो उन्होंने आदिशक्ति की प्रार्थना की। आदिशक्ति माता सती ने उन्हें उनके यहां कन्या के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। दोनों ने उस कन्या का नाम रखा पार्वती। पार्वती अर्थात पर्वतों की रानी। इसी को गिरिजा, शैलपुत्री और पहाड़ों वाली रानी कहा जाता है। माता पार्वती ने ही शुम्भ, निशुम्भ, महिषासुर आदि असुरों का वध किया था और इनकों की नवदुर्गा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। हालांकि आदि... आदि दुर्गा माता को परब्रह्म सदाशिव की अर्धांगिनी के रूप में चित्रित किया गया है जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश के माता-पिता हैं। उक्त दुर्गा के रूप
में ही माता पार्वती को भी चित्रित किया गया है।
३.माता उमा - पार्वती को ही उमा कहा जाता था या कि उमा नाम से एक अलग देवी थी यह स्पष्ट नहीं है । देवी उमा को भूमि की देवी भी कहा जाता है। मां उमा देवी दयालु और सरल ह्दय की देवी हैं। आराधना करने पर वह जल्द उमा के साथ महेश्वर शब्द का उपयोग किया जाता है। हो सकता है कि जब शंकर जी महेश रूप में  आए तब पार्वती भी उमा हो गई।
        कश्मीर में एक स्थान है उमा नगरी। यह नगरी अनंतनाग क्षेत्र के उत्तर में हिमालय में बसी है। यहां विराजमान है उमा देवी। भक्तों का ऐसा विश्वास है कि देवी स्वयं यहां एक नदी के रूप में रहती हैं जो ओंकार (अर्थात संपूर्ण विश्व) का आकार बनाती है जिसके साथ पांच झरने भी हैं।  माना जाता है कि उमा देवी उत्तराखंड की थीं। उत्तराखंड में चमोली जिले के कर्णप्रयाग नामक स्थान पर उनका एक पौराणिक मंदिर भी बना हुआ है। स्थानीय लोगों की मान्यता अनुसार डिमरी जाति के लोगों को उमा देवी के मायके वाला माना जाता है, जबकि कापरिपट्टी के शिव मंदिर को उनका ससुराल समझा जाता है। 
४.मां महाकाली - भगवान शिव की चौथी पत्नी मां काली को माना जाता है। काली ने भयानक दानवों का संहार किया था। वर्षों पहले एक ऐसा भी दानव हुआ जिसके रक्‍त की एक बूंद अगर धरती पर गिर जाए तो हजारों रक्तबीज पैदा होजाते थे |  रक्तबीज के संहार के उपरांत अनियंत्रित क्रोध में माँ काली को शिव पर पैर रखने का पश्चाताप हुआ और इस महापाप के कारण ही उन्हें वर्षों तक हिमालय में प्रायश्चित के लिए भटकना पड़ा था। व्यास नदी के किनारे जब माता काली ने भगवान शिव का ध्यान किया तो आखिरकार भगवान शंकर ने उन्हें दर्शन दिए और इस तरह से मां काली को भूलवश हुए अपने महापाप से मुक्ति मिली।  
 चित्र—माँ काली-बालक रूप में शिव को पयपान...
       यह भी कहाजाता है की शिव द्वारा बालक का रूप रखकर रोते हुए सम्मुख आने पर द्रवित होकर काली अपना भयावह रूप त्याग, सामान्य मातृ रूप में आगई थीं |
       देवभूमि हिमाचल के कांगड़ा परागपुर में यह स्थान अब कालीनाथ कालेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है।  
भगवान शिव की एक पुत्री भी थीं-- भगवान शिव के दो पुत्र गणेश और कार्तिकेय के बारे में तो सभी जानते हैं, इसके अलावा कई जगहों पर भगवान शिव के 6 पुत्र होने के बारे में भी वर्णन मिलता है। लेकिन भगवान शिव और माता पार्वती के एक पुत्री भी थी। इसका वर्णन बहुत कम जगहों पर किया गया है इनका नाम था 'अशोक सुंदरी' था | इनका विवाह राजा नहुष से हुआ था।
        माता पार्वती के अकेलेपन को दूर करने हेतु कल्पवृक्ष नामक पेड़ के द्वारा ही अशोक सुंदरी की रचना हुई थी। पद्म पुराण के अनुसार एक बार माता पार्वती विश्व में सबसे सुंदर उद्यान में जाने के लिए भगवान शिव से कहा। तब भगवान शिव पार्वती को नंदनवन ले गए, वहां माता को कल्पवृक्ष से लगाव हो गया और उन्‍होंने उस वृक्ष को लेकर कैलाश आ गईं।
      पार्वती ने अपने अकेलेपन को दूर करने हेतु उस वृक्ष से यह वर मांगा कि उन्‍हें एक कन्या प्राप्त हो, तब कल्पवृक्ष द्वारा अशोक सुंदरी का जन्म हुआ। माता पार्वती ने उस कन्या को वरदान दिया कि उसका विवाह देवराज इंद्र जैसे शक्तिशाली युवक से होगा।
     एक बार अशोक सुंदरी अपने दासियों के साथ नंदनवन में विचरण कर रहीं थीं तभी वहां हुंड नामक राक्षस का आया। जो अशोक सुंदरी के सुंदरता से मोहित हो गया और उसने अशोक सुंदरी के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। लेकिन अशोक सुंदरी ने अपने भविष्य के बारे में बताते हुए विवाह के बारे में भी बताया कि उनका विवाह नहुष से ही होगा। यह सुनकर राक्षस ने कहा कि वह नहुष को मार डालेगा। ऐसा सुनकर अशोक सुंदरी ने राक्षस को शाप दिया कि उसकी मृत्यु नहुष के हाथों ही होगी। वह घबरा गया जिसके चलते उसने नहुष का अपहरण कर लिया।
      उस समय नहुष काफी छोटे थे। नहुष को राक्षस हुंड की एक दासी ने बचाया। इस तरह महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में नहुष बड़े हुए और उन्होंने हुंड का वध किया। इसके बाद नहुष तथा अशोक सुंदरी का विवाह हुआ तथा वह ययाति जैसे वीर पुत्र तथा सौ रूपवती कन्याओं की माता बनीं। इंद्र के अभाव में नहुष को ही आस्थायी रूप से इंद्र बनाया गया, उसके घमंड के कारण उसे श्राप मिला तथा इसीसे उसका पतन हुआ। बादमें इंद्र नें अपनी गद्दी पुन: ग्रहण की।
चित्र-शिवपुत्रीअशोक सुन्दरी व कल्पवृक्ष