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गुरुवार, 6 जुलाई 2017

गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी संपन्न --डा श्याम गुप्त....

गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी संपन्न
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प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को होने वाली काव्यगोष्ठी दि.६-७-१७ गुरूवार को डा श्यामगुप्त के आवास के-३४८, आशियाना, लखनऊ पर संपन्न हुई | गोष्ठी में अगीत परिषद् के अध्यक्ष साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य , नव-सृजन संस्था के अध्यक्ष डा योगेश गुप्त, डा श्याम गुप्त, श्रीमती सुषमा गुप्ता, अनिल किशोर शुक्ल ‘निडर’, श्री रामदेव लाल विभोर महामंत्री काव्य कला संगम , प्राची संस्था के अध्यक्ष डा सुरेश प्रकाश शुक्ल, श्री बिनोद कुमार सिन्हा उपस्थित थे | विशेष अतिथि एवं श्रोता के रूप में रेलवे अस्पताल लखनऊ के पूर्व मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डा. पुरुषोत्तम सिंह एवं पूर्व रेडियो व टीवी सिंगर श्रीमती पुरुषोत्तम सिंह ने गोष्ठी को शोभायमान किया |
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श्री बिनोद सिन्हा द्वारा अपनी कृति –पांडुलिपि में गणेश वंदना पहले लिखे जाने पर चर्चा हुई | सिन्हा जी का कथन था कि उनके विचार से गणेश भगवान हैं अतः वन्दना पहले की जानी चाहिए | श्याम गुप्त का मत था की गणेश प्रथम पूज्य देव हैं परन्तु भगवान् नहीं हैं | इस प्रकरण में ब्रह्म, भगवान् व ईश्वर पर भी संक्षिप्त चर्चा हुई |
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डा.योगेश के अनुसार गणेश प्रथम पूज्य हैं, उनकी प्रथम पूजा विभिन्न धार्मिक आदि कार्यों में तो की ही जानी चाहिए परन्तु साहित्यिक कृतियों में वाग्देवी माँ सरस्वती की ही वन्दना पहले होनी चाहिए | डा श्याम गुप्त ने सहमत होते हुए कहा कि दोनों की वंदना करते समय गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी ‘वन्दे वाणी विनायकौ’ कहा है |
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श्री अनिल किशोर निडर की जिज्ञासा पर डा श्यामगुप्त ने बताया की संयुक्ताक्षर से पूर्व आने वाले लघु अक्षर को मात्रा गणना हेतु दीर्घ माना जाता है |
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बिनोद सिन्हा जी का कथन था की कविता स्वयंभू उद्भूत होती है , यदि सप्रयास लिखा जाय तो ता वह बनावटी कविता ही होती है |
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डा श्याम गुप्त की सद्य प्रकाशित रचना ;ईशोपनिषद का काव्य भावानुवाद; एवं बिनोद कुमार सिन्हा की शीघ्र प्रकाश्य कृति ‘गीता सारांश, अगीत में’ के तादाम्य में गीता पर ईशोपनिषद का प्रभाव दोनों की विषय समनुरूपता पर डा श्यामगुप्त व सिन्हा जी में चर्चा हुई |
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सुप्रसिद्ध दार्शनिक कवि डा योगेश गुप्त ने अपनी कई दार्शनिक रचनायें प्रस्तुत की, अपने अपने नाम को ढूँढने में व्यस्त हम ---
हम सब मानते थे / हमारा नाम ही
पहचान है ,/ और विडम्बना यह थी कि,
हम स्वयं को भी / अपने नाम से ही पहचानते थे |
--------श्री अनिल किशोर शुक्ल निडर ने वर्षा गीत इस प्रकार प्रस्तुत किया---
नभ पर काले बादल छाते,
कभी रंगीले बनकर आते
वसुधा को रसमय कर जाते |
------- श्री बिनोद कुमार सिन्हा ने महाकवि विद्यापति की शब्दावली निहित तान में गिरधर गोपाल का वर्णन किया---
गले वैजन्ती कनक मोर मुकुट अति भावन
अंग गगन सम कान्ति श्यामल श्यामल
अलक भ्रमर सी तिलक कस्तूरी माल सुहावन,
झलक चन्द्र छवि श्यामल गिरिधर गोवर्धन |
------- डा श्याम गुप्त ने वर्षा गीत, श्रृंगार गीत एवं एक ग़ज़ल यूं पढी –
पुरस्कार की तो थी हमको भी चाहत बहुत
मगर कभी शर्त पूरी हम नहीं कर पाए |
--------श्री रामदेव लाल विभोर ने अपनी रचना प्रस्तुत की ----
मर्ज़ एस दावा बेअसर,
नब्ज़ बोले की मीठा ज़हर है |
------- डा सुरेश प्रकाश शुक्ल ने किसान से तादाम्य बिठाते हुए गाया –
किसना होईगे चतुर किसान / पैदा करत हैं गेहूं धान |
गन्ना आलू बोवें नकदी की आशा मा,
आल्हा बिरहा गावैं झूमें चौमासा मा |
------ श्रीमती सुषमा गुप्ता ने पावस गीत सुनाया ...
आई सावन की बहार
बदरिया घिर घिर आये
---------अगीताचार्य डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने कई रचनाये व गीत प्रस्तुत किये, एक मुक्तक देखिये ....
‘शील से बोझिल झुका हो वह नयन है,
हो न सीमा जिस पटल की वह गगन है |
रोकने पर भी न रुकता हो कभी जो ,
नित्य नूतन पंथ शोधे वह चरण है ||
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डा सत्य द्वारा दो शब्द बोलने के अनुरोध पर विशिष्ट अतिथि व श्रोता डा पी सिंह ने कहा आप लोग विज्ञजनों के सान्निध्य का अवसर मिला, काव्य रस का आनंद मिला | श्रीमती सिंह ने रचनाओं की प्रशंसा करते हुए इसे आनंददायक क्षण बताया |
जलपान के उपरांत सुषमा गुप्ता जी के धन्यवाद ज्ञापन के साथ गोष्ठी का समापन हुआ |

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (07-07-2015) को "शब्दों को मन में उपजाओ" (चर्चा अंक-2660) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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