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बुधवार, 2 अगस्त 2017

गरीबी, भूखे को रोटी-दूध .....मंदिर, भगवान, आस्था...डा श्याम गुप्त ....



               प्रेमचंद आदि गरीबों के मसीहा एवं आजकल कवियों, लेखकों, व्यंगकारों , समाज के ठेकेदारों, नेताओं, मीडिया का प्रिय विषय है...गरीबी, भूखे को रोटी-दूध .....मंदिरों, भगवान, मूर्तियों आदि आस्थाओं को तोड़कर उंनके स्थान पर ---गरीबों, भूखों को देना चाहिए ..आदि आदि --

-----उनके लिए कुछ छंद प्रस्तुत हैं----
\\
मेरे कारण नहीं है कोई, इस जगत में भूखा प्यासा,
यदि इक दिन मैं रोटी देदूं , क्या पूरी हो सब अभिलाषा |

पोथी लिखी व गाल बजाये, युगों गरीब गरीब चिल्लाए,
जो जैसा अब भी वैसा ही, क्यों न प्रभु से नेह लगाये |

जिसका जैसा भाग्य-कर्म है, उसको वैसा देता राम,
हम-तुम दें, या लिखें प्रेमचंद, आये नहीं किसी के काम |

पाथर पूजें, दूध चढे तो, रहे आस्था मन में जान,
बिना आस्था, कैसे कहिये, दे गरीब को कोई दान |

धर्म आस्था को नहीं तोडिये, यह है ईश्वर का सम्मान,
नारायण सम्मान नहीं यदि, कैसे हो नर का, श्रीमान |

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (04-08-2017) को "राखी के ये तार" (चर्चा अंक 2686) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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